दुमका दर्पण ब्यूरो, दुमका: हुल दिवस की पूर्व संध्या पर दुमका स्थित एस. पी. कॉलेज के इतिहास विभाग द्वारा महाविद्यालय सभागार में एक गरिमामय एवं विचारोत्तेजक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य 1855 के संताल हुल आंदोलन के इतिहास, उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व तथा वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर चर्चा करना था। कार्यक्रम में महाविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो को दी गई श्रद्धांजलि
कार्यक्रम का शुभारंभ संताल हुल के महानायक सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव तथा वीरांगना फूलो-झानो के चित्रों पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। उपस्थित सभी लोगों ने हुल आंदोलन के अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साहस, संघर्ष और बलिदान को याद किया। इस दौरान पूरा सभागार देशभक्ति, जनजातीय गौरव और ऐतिहासिक चेतना के वातावरण से ओत-प्रोत रहा।
हुल दिवस अन्याय के विरुद्ध जनशक्ति की विजय का प्रतीक : प्राचार्य
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. के. पी. यादव ने कहा कि हुल दिवस केवल एक ऐतिहासिक तिथि नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध जनशक्ति की विजय का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि सिद्धो-कान्हू, चाँद-भैरव और फूलो-झानो ने जिस साहस, संगठन क्षमता और नेतृत्व का परिचय दिया, वह आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उन्होंने विद्यार्थियों से इतिहास को केवल परीक्षा के विषय के रूप में नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा के रूप में पढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि झारखंड की धरती सदैव वीरों और क्रांतिकारियों की भूमि रही है तथा संताल हुल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
30 जून 1855 को भोगनाडीह से शुरू हुआ था संताल हुल आंदोलन
इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. सुमित्रा हेमब्रम ने अपने व्याख्यान में हुल आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 30 जून 1855 को भोगनाडीह से प्रारंभ हुआ संताल हुल केवल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह नहीं था, बल्कि महाजनी शोषण, जमींदारी व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के खिलाफ जनआक्रोश की सशक्त अभिव्यक्ति था।
उन्होंने कहा कि संताल समाज ने अपनी अस्मिता, अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए जो संघर्ष किया, वह भारतीय इतिहास में अद्वितीय है। साथ ही विद्यार्थियों से स्थानीय इतिहास, जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
जनजातीय आंदोलनों को इतिहास में मिलना चाहिए उचित स्थान
अपने संबोधन में डॉ. संजीव कुमार ने कहा कि हुल आंदोलन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आधारशिला के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनजातीय आंदोलनों को इतिहास में अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया, जबकि इन आंदोलनों ने औपनिवेशिक शासन की जड़ों को चुनौती दी थी।
उन्होंने विद्यार्थियों को शोधपरक दृष्टिकोण विकसित करने तथा स्थानीय इतिहास, लोक परंपराओं और जनजातीय संस्कृति का गंभीर अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।
महिलाओं की भूमिका भी रही प्रेरणादायक
डॉ. पूनम बिंझा ने कहा कि हुल आंदोलन सामाजिक न्याय, समानता और आत्मसम्मान का सशक्त संदेश देता है। उन्होंने विशेष रूप से फूलो-झानो जैसी वीरांगनाओं के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं ने सामाजिक और राष्ट्रीय आंदोलनों में हमेशा अग्रणी भूमिका निभाई है। आज भी महिला सशक्तिकरण के लिए उनका जीवन प्रेरणा का स्रोत है।
जनजातीय संस्कृति हमारी अमूल्य धरोहर : डॉ. प्रतिभा टुडू
डॉ. प्रतिभा टुडू ने कहा कि जनजातीय समाज की भाषा, लोककला, संस्कृति और जीवन दर्शन भारतीय विरासत की अमूल्य धरोहर हैं। हुल दिवस हमें अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक उसे पहुंचाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।
युवाओं को राष्ट्र निर्माण में निभानी होगी महत्वपूर्ण भूमिका
रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. कुमार सौरभ ने कहा कि हुल आंदोलन केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और सामाजिक चेतना का जीवंत संदेश है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी है।
उन्होंने विद्यार्थियों से वैज्ञानिक सोच, नैतिक मूल्यों और सामाजिक संवेदनशीलता को अपनाने का आग्रह करते हुए कहा कि जब युवा अपने इतिहास और विरासत से जुड़ते हैं, तभी वे भविष्य का मजबूत निर्माण कर सकते हैं।
विद्यार्थियों ने पूछे सवाल, विशेषज्ञों ने दिए जवाब
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों ने हुल आंदोलन के इतिहास और उसके महत्व से जुड़े कई प्रश्न पूछे। वक्ताओं ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर उनकी जिज्ञासाओं का समाधान किया। संवादात्मक सत्र ने कार्यक्रम को और अधिक प्रभावशाली एवं ज्ञानवर्धक बना दिया।
वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि झारखंड की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में शैक्षणिक संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे कार्यक्रम विद्यार्थियों में शोध, चिंतन और सामाजिक चेतना को मजबूत करते हैं।
राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का हुआ समापन
कार्यक्रम के अंत में हुल आंदोलन के अमर शहीदों को सामूहिक श्रद्धांजलि अर्पित की गई। सभी उपस्थित लोगों ने उनके आदर्शों पर चलने और समाज में समानता, भाईचारे तथा सामाजिक न्याय की भावना को मजबूत करने का संकल्प लिया। इतिहास विभाग की ओर से सभी अतिथियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
दुमका दर्पण का नजरिया : एस. पी. कॉलेज, दुमका द्वारा आयोजित यह विचार गोष्ठी केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को झारखंड के गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है। संताल हुल आंदोलन ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को नई दिशा दी थी। ऐसे आयोजनों के माध्यम से विद्यार्थियों में इतिहास के प्रति रुचि, सामाजिक उत्तरदायित्व और अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की भावना विकसित होती है। झारखंड की इस अमूल्य विरासत को सहेजना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है।

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